नई दिल्ली। दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक, 2026 संसद में पारित हो गया है। राज्यसभा ने विधेयक को ध्वनि मत से पारित कर दिया। लोकसभा इसे पहले ही पारित कर चुकी है। कॉरपोरेट मामलों के राज्य मंत्री हर्ष मल्होत्रा ने विधेयक पेश किया, जिसका उद्देश्य दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता 2016 में संशोधन करना है। विधेयक का उद्देश्य कंपनियों और व्यक्तियों के बीच प्रक्रियात्मक देरी और व्याख्या संबंधी मुद्दों का समाधान करना है।
विधेयक पर चर्चा का उत्तर देते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि कहा कि दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता संशोधन विधेयक में कुल 12 संशोधन हैं, जिनमें से 11 चयन समिति द्वारा अनुशंसित हैं और एक संशोधन सरकार ने किया है।
वित्त मंत्री ने कहा कि देश में बैंकिंग क्षेत्र की स्थिति सुधारने, विशेष रूप से संकटग्रस्त परिसंपत्तियों के समाधान में दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता- आईबीसी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने कहा कि इस कानून का उद्देश्य कभी भी केवल ऋण वसूली तंत्र के रूप में कार्य करना नहीं था।
आईबीसी के तहत कम वसूली दरों को लेकर कई सदस्यों की चिंताओं पर वित्त मंत्री ने आधिकारिक आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि आईबीसी ने एक हजार 376 कंपनियों के समाधान में सहायता की है, जिससे लेनदारों को चार लाख 11 हजार करोड़ रुपये वसूल करने में मदद मिली है। उन्होंने कहा कि वित्तीय लेनदारों ने इस प्रक्रिया के तहत अपने दावों का 64% से अधिक वसूल किया है। उन्होंने सदन को सूचित किया कि वाणिज्यिक बैंकों ने गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों- एनपीए से कुल एक लाख 4 हजार करोड़ रुपये से अधिक की वसूली की है, और इसमें से अकेले आईबीसी का योगदान 54 हजार 528 करोड़ रुपये से अधिक है। वित्त मंत्री जी ने कहा कि सरकार ने मौजूदा दिवालियापन ढांचे को और मजबूत करने के लिए दिवाला और शोधन अक्षमता, 2016 में संशोधन किए हैं।
श्रीमती सीतारमण ने कहा कि इन संशोधनों का उद्देश्य व्यावहारिक चुनौतियों का समाधान करना, सर्वोत्तम प्रथाओं को शामिल करना और 2016 में कानून के लागू होने के बाद के अनुभवों को प्रतिबिंबित करना है। इससे पहले, चर्चा की शुरुआत करते हुए कांग्रेस के राजीव शुक्ला ने कहा कि दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता- आईबीसी को संकटग्रस्त और गैर-निष्पादित कंपनियों को पुनर्जीवित करने के लिए 2016 में लाया गया था। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि एनपीए के बोझ तले दबी कंपनियों का पुनर्गठन किया जा सके, संचालन फिर से शुरू हो सके और रोजगार सुरक्षित रहे। उन्होंने कहा कि शुरुआती वर्षों में आईबीसी के ठोस परिणाम मिले। श्री शुक्ला ने कहा कि समय बीतने के साथ वह ढांचा अब कमजोर पड गया है।
भाजपा के डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल ने कहा कि 2016 में इस संहिता के लागू होने के समय अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की गैर निष्पादित परिसंपत्तियां – एनपीए लगभग 11.18% थीं। उन्होंने कहा कि इस कानून के लागू होने के बाद पिछले वर्ष सितंबर में सकल एनपीए घटकर करीब 2% हो गई। डॉ. अग्रवाल ने बताया कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के मामले में सकल एनपीए 14.58% तक थीं जो पिछले वर्ष सितंबर तक घटकर 2.3% हो गईं। उन्होंने बताया कि 2024-25 के दौरान, अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों ने चार लाख करोड़ रुपये से अधिक का अब तक का उच्चतम लाभ दर्ज किया, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को एक लाख 78 हजार करोड़ रुपये का लाभ हुआ।
भाजपा सांसद ने कहा कि आईबीसी ढांचे की शुरुआत से पहले संकटग्रस्त परिसंपत्तियों से वसूली केवल 15 से 20% तक सीमित थी। दिवाला और शोधन अक्षमता तंत्र की स्थापना के बाद 2024-25 में वसूली दर बढ़कर 36.6% हो गई। टीएमसी के सुकेनेदु शेखर रे ने दावा किया कि दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता को जल्दबाजी में लाया गया ताकि डिफ़ॉल्ट करने वाली कंपनियों को देनदारियों से बचने का रास्ता मिल सके। उन्होंने कहा कि पिछले नौ वर्षों में आईबीसी अधिनियम में छह संशोधन और नियमों में अब तक 122 संशोधन किए गए हैं।
