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भारतीय वायुसेना के ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला अंतरिक्ष से धरती पर लौट आए

नई दिल्ली: भारतीय वायुसेना के ग्रुप कैप्टन सुभांशु शुक्ला अंतरिक्ष स्टेशन से धरती पर वापसी की। शुभांशु अपने तीन साथियों के साथ एक्सिओम-4 मिशन के तहत अंतरिक्ष में गए थे। ऐसे में ये सभी सोमवार शाम भारतीय समयानुसार 4 बजकर 45 मिनट (10 मिनटी की देरी से) पर अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन से धरती के लिए रवाना हुए थे।
वहीं, आज यानी मंगलवार को ये दल लगभग भारतीय समयानुसार दोपहर 3 बजे के बाद कैलिफोर्निया के समुद्री तय पर सकुशल उतरा। ये सफर लगभग साढे़ 22 घंटे में पूरा हुआ। वहीं, आप क्या जानते हैं कि आखिर एस्ट्रोनॉट अंतरिक्ष से वापस कैसे आते हैं? शायद नहीं, पर आप यहां इस बारे में विस्तार से जान सकते हैं। तो चलिए जानते हैं इसका पूरा प्रोसेस क्या होता है…
अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष से पृथ्वी पर लौटने के लिए काफी सावधानीपूर्वक एक नियोजित प्रक्रिया को अपनाना पड़ता है। वापस आने के लिए अंतरिक्ष यात्रियों को एक विशेष अंतरिक्ष यान में प्रवेश करना होता है जिसे एस.एस.एस कहा जाता है। जैसे, शुभांशु जिस यान से वापस आ रहे हैं उसका नाम ड्रैगन है। इसमें एक कैप्सूल होता है जो पृथ्वी में प्रवेश करते हुए यान से अलग हो जाता है।
अब जब कैप्सूल अलग हो जाता है तो ये पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करता है। पर असली चुनौती यहीं पर शुरू होती है क्योंकि यहां पर घर्षण के कारण तापमान बहुत ही अधिक बढ़ जाता है। ऐसे में कैप्सूल को सुरक्षित रखती है इसमें लगी हीट शील्ड। यहां पर कैप्सूल बड़ी तेजी से आगे बढ़ता है जिसके कारण कई दिक्कतें आने का खतरा रहता है।
अब जब ये कैप्सूल तेजी से धरती की तरफ बढ़ रहा होता है तो चुनौती होती है इसकी स्पीड कम करने की। इसके लिए पैराशूट का इस्तेमाल किया जाता है जिससे इसकी गति को धीमा किया जाता है। ये पैराशूट काफी बड़े होते हैं, ताकि तय अनुसार कैप्सूल की स्पीड को कम किया जा सके। कैप्सूल को समुद्र में उतारा जाता है जिसे स्प्लैशडाउन कहा जाता है। शुभांशु जिस कैप्सूल से धरती पर आए, वो कैलिफोर्निया के समुद्री तट पर उतरा।
जब एस्ट्रोनॉट अंतरिक्ष से धरती पर लौट आते हैं, तो उन्हें कैप्सूल से बाहर निकाला जाता है और फिर उन्हें कुछ दिनों के लिए डॉक्टरों की निगरानी में रखा जाता है, ताकि उनका मेडिकल चेकअप किया जा सके। स्पेस से लौटने के बाद शुभांशु और उनकी टीम को भी 7 दिनों तक पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण में ढलने के लिए पुनर्वास प्रक्रिया से गुजरना होगा।

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