नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सभी स्कूलों में मुफ्त सैनेटरी नैपकिन उपलब्ध कराने के निर्देश वाले फैसले में कहा है कि आरटीई एक्ट की धारा-19 में बताए गए मानकों का अनुपालन वित्तीय सुविधा के अधीन नहीं है।
अगर दूसरे शब्दों में कहा जाए तो राज्य को मानकों और मानदंडों का अनुपालन नहीं करने के लिए धन की अनुपलब्धता का हवाला देने की अनुमति नहीं दी जा सकती। शीर्ष अदालत ने कहा, वह इसलिए ऐसा रही है क्योंकि राज्य, शिक्षा तक निर्बाध पहुंच प्रदान करने के लिए बाध्य हैं।
शीर्ष अदालत ने फैसले में राज्यों के दायित्व पर जोर देते हुए कहा कि यह बात धारा-आठ और नौ को देखते हुए और पुष्ट होती है, जिसमें राज्य सरकारों और स्थानीय प्राधिकरणों को स्कूल भवन, शिक्षण कर्मचारी, सीखने के उपकरण आदि उपलब्ध कराने का कर्तव्य सौंपा गया है।
सरकारों और स्थानीय प्राधिकरणों को प्रत्येक बच्चे के प्रवेश, उपस्थिति और प्राथमिक शिक्षा पूर्ण करने को सुनिश्चित करने की निगरानी करनी होगी। सबसे खास बात यह है कि उन्हें मानकों के मुताबिक उच्च गुणवत्ता वाली प्राथमिक शिक्षा सुनिश्चित करनी होगी।
कोर्ट ने कहा कि निर्बाध पहुंच की आवश्यकता को वास्तविक अर्थ में समझा जाना चाहिए। यह न केवल स्कूल भवनों तक औपचारिक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए बाध्य करता है, बल्कि स्कूल में बच्चे की उपस्थिति में बाधा डालने वाली सभी बाधाओं को दूर करने के लिए भी बाध्य करता है।
इस संदर्भ से देखें तो सैनेटरी नैपकिन और उसे निस्तारित (डिस्पोसल) करने के स्वच्छ तंत्र का नहीं होना लड़कियों की स्कूल में अनुपस्थिति और स्कूल छोड़ने का कारण बनती है।
कोर्ट ने कहा कि यह विफलता प्रशासनिक नहीं, बल्कि संवैधानिक है। इससे संविधान की घोर विफलता उजागर होती है, क्योंकि कानून में स्कूल भवन तक बाधा रहित पहुंच और लड़कों व लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय अनिवार्य किए गए हैं।
केवल प्रक्रियात्मक प्रकृति के नहीं हैं, बल्कि आरटीई अधिनियम की धारा-तीन और विशेष रूप से संविधान के अनुच्छेद-21ए के तहत शिक्षा के अधिकार के प्रभावी क्रियान्वयन का अभिन्न हिस्सा हैं। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले का उद्देश्य और मर्म बताते हुए कहा कि यह आदेश व चर्चा केवल कानूनी व्यवस्था के हितधारकों के लिए नहीं है।
ये उन कक्षाओं के लिए भी है जहां लड़कियां मदद मांगने में संकोच करती हैं। ये उन शिक्षकों के लिए भी है जो मदद करना चाहते हैं, लेकिन संसाधनों की कमी के कारण असमर्थ हैं। उन अभिभावकों के लिए भी है जो शायद अपनी चुप्पी के प्रभाव को नहीं समझते। समाज के लिए भी है ताकि ये स्थापित हो सके कि प्रगति का आकलन इस बात से होता है कि हम सबसे कमजोर लोगों की रक्षा कैसे करते हैं।
कोर्ट ने कहा कि वह हर उस लड़की को संदेश देना चाहते हैं, जो शायद स्कूल से अनुपस्थित हो गई, जबकि इसमें उसकी कोई गलती नहीं थी। कोर्ट ने कहा कि ये शब्द अदालतों, कानूनी समीक्षा रिपोर्टों से परे जाकर समाज की रोजमर्रा की चेतना तक पहुंचने चाहिए।
