मिच्छामी दुक्कदम 2024: ‘मिच्छामी दुक्कदम’ से होगा जैन धर्म के महापर्व ‘पर्यूषण’ का समापन

मिच्छामि दुक्कड़म

महावीर स्वामी ने कहा है-

खामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमन्तु मे।

मित्तिमे सव्व भुश्च वैरं ममझं न केनई।

– यानी सभी अपराधियों के साथ मेरी मैत्री है, किसी के साथ मेरी मैत्री नहीं है। यह वाक्य पारंपरिक रूप से है, मगर विशेष कार्य है। इसके अनुसार फर्म फर्म से सबसे जरूरी क्षमा करना है।

संवत्सरी पर्व 2024: श्वेतांबर और दिगंबर जैन धर्मावलम्बी भाद्रपद मास में पर्युषण पर्व मनाते हैं। इस पर्व का मूल उद्देश्य अपनी आत्मा को शुद्ध बनाने के लिए जरूरी निगमों पर ध्यान केंद्रित करना है। जहां श्वेतांबर संप्रदाय के पर्यूषण आठ दिन चल रहे हैं।
वहीं दिगंबर जैन संप्रदाय वाले दस दिन तक पर्यूषण कर चुके हैं। इन्हें ‘दशलक्षण महापर्व’ के नाम से भी जाना जाता है। और श्वेतांबर जैन संवत्सरी/क्षमावाणी पर्व पर ‘मिच्छामी दुक्कम्’ मोक्ष याचना करते हैं। इस वर्ष श्वेतांबर समाज का महापर्व 01 सितंबर से 08 सितंबर तक शुरू होगा और अंतिम दिन संवत्सरी महापर्व यानी क्षमापर्व मनाया जाएगा, वहीं दिगंबर समाज का महापर्व 08 सितंबर से शुरू होकर 17 सितंबर 2024 तक मनाया जाएगा।

जैन धर्म के अनुसार इन दिनों मंदिर, उपाश्रय, स्थान और समवशरण क्षेत्र में ज्यादातर समय तक रहना जरूरी माना जाता है। पूजन, आरती, समागम, उपवास, त्याग-तपस्या में अधिक से अधिक समय तक प्रयास किया जाता है और दैनिक कार्यों से दूर रहने का प्रयास किया जाता है। संयम और विवेक का निरंतर प्रयोग, अभ्यास बना रहता है।

आजकल कल्पसूत्र, तत्वार्थ सूत्र का वाचन किया जाता है, संत-मुनि और विद्वान पंडितों के सान्निध्य में स्वाध्याय किया जाता है। तथा उपवास, बेला, तेला, अट्ठाई, मासखमन जैसे लंबे समय तक बिना कुछ किए, बिना कुछ पिए, निर्जला तपस्या करने वाले लोगों की ओर जाते हैं। और मित्रता आठ दिव्य पर्व के बाद क्षमा, अहिंसा और मैत्री का पर्व ‘संवत्सरी’ आता है।

जैन धर्मावलंबी जाने-अनजाने हुई घटना के लिए संवत्सरी पर्व पर एक-दूसरे से क्षमा मांगते हैं। मान्यता है कि श्वेतांबर जैन समाज के पर्यूषण पर्व आयोजित किये जाते हैं और संवत्सरी महापर्व मनाया जाता है।

जैन धर्म की परंपरा के पर्यूषण पर्व के अंतिम दिन क्षमावाणी/मातृ दिवस पर सभी एक-दूसरे से ‘मिच्छामी दुक्कम्’ के अनुसार क्षमा मांगते हैं, साथ ही यह भी कहा जाता है कि मेरे मन, वचन, काया से जाने-अनजाने आप दिल दुखा या दुखिया हो तो मैं हाथ जोड़कर आपसे क्षमा मांगता/मांगती हूं।

जैन धर्म के ‘मिच्छामी’ का भाव क्षमा करने और ‘दुक्कडम्’ का अर्थ एक दूसरे से जुड़ा हुआ है, अर्थात मेरे अनुसार जाने-अनजाने की भावना के लिए मुझे क्षमा करें।

काफी जैन ग्रंथों की रचना प्राकृत भाषा में हुई है। ‘मिच्छामी दुक्कम्’ भी प्राकृत भाषा का शब्द है। जैन धर्मावलम्बियों का आत्मशुद्धि पर्व है। इस प्रकार पर्युषण पर्व आत्मशुद्धि के साथ मनोमालिन्य दूर करने और सभी से क्षमा-याचना मित्र का सुअवसर प्रदान करने वाला महापर्व है।

आचार्य महाश्रमण कहते हैं कि- क्षमापना से चित्त में अह्लाद का भाव पैदा होता है और अह्लाद भाव युक्त व्यक्ति मैत्रीभाव उत्पन्न होता है और मैत्रीभाव प्राप्त होने पर व्यक्तिगत भाव विशुद्धि कर निर्भय हो जाता है। जीवन में अनेक लोगों से संपर्क होता है तो कटुता भी वर्षभर के दौरान आ सकती है। किसी व्यक्ति को कटुता आने पर तुरंत ही मन में साफ कर लेना चाहिए और संवत्सरी पर तो सुनिश्चित करें कि उसे ही साफ कर लेना चाहिए।

यह पर्व भारत के अलावा दुनिया के अन्य कई स्थानों जैसे अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, जापान और अन्य देशों में भी यह पर्व मनाया जाता है। जैन धर्म के दर्शन पर्व से विदेश भी गुलामा नहीं है। यहां रहने वाले जैन धर्मावलंबी भी इन दिनों तप-आराधना करके ‘मिच्छामी दुक्कम’ का पर्व मनाते हैं और अपने-अपने यहां दूर रहने वाले अपने साधु-संपर्क और परिचितों-मित्रों से माफ़ी मांगकर संवत्सरी महापर्व मनाते हैं।

ऐसा माना जाता है कि आप अन्य सभी प्राणियों को अभयदान देते हैं और उनकी रक्षा करने का संकल्प लेते हैं। तब आप संयम और विवेक का तिरस्कार करेंगे, आत्मिक शांति का अनुभव करेंगे और सभी भिक्षुओं और मछुआरों के प्रति मैत्रीभाव का अनुभव करेंगे। आत्मा तभी शुद्ध रह सकती है, जब वह अपने से बाहरी हस्तक्षेप न करे और बाहरी तत्व से न हो। क्षमा भाव ही मूलमंत्र है।

सभी को ‘मिच्छामी दुक्कम्’।
अस्वीकरण (अस्वीकरण) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी वैज्ञानिक सिद्धांत, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, अभिलेख एवं समाचार केवल आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न तथ्यों से उपलब्ध हैं। संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। स्वास्थ्य या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें। इस सामग्री को जनरुचि को ध्यान में रखते हुए यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

Leave a comment