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Oil Trade में बदलता वैश्विक समीकरण: अमेरिका, रूस और भारत — भारत पर क्या हैं इसके प्रभाव?

Oil Trade

पिछले कुछ दशकों में वैश्विक तेल व्यापार (Oil Trade) में बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। तेल की मांग-आपूर्ति में उतार-चढ़ाव, भू-राजनीतिक तनाव, आर्थिक परिवर्तन और ऊर्जा नीतियों ने इस क्षेत्र को जटिल बना दिया है। इस वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका, रूस और भारत तीन ऐसे प्रमुख देश हैं, जिनकी भूमिका अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार को सीधे प्रभावित करती है।

अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक बन चुका है, रूस एक प्रमुख तेल निर्यातक देश है, जबकि भारत तेजी से बढ़ती ऊर्जा मांग वाला आयात-निर्भर देश है। इन तीनों देशों के बीच बनते-बिगड़ते संबंध भारत की ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव डालते हैं।

अमेरिका, रूस और भारत: तेल भंडार व उत्पादन की स्थिति
अमेरिका

विश्व का सबसे बड़ा तेल उत्पादक

लगभग 11.9 मिलियन बैरल प्रतिदिन उत्पादन

अनुमानित 68 अरब बैरल तेल भंडार

शेल ऑयल और फ्रैकिंग तकनीक ने अमेरिका को नेट ऑयल एक्सपोर्टर बना दिया है

रूस

विश्व के प्रमुख तेल निर्यातकों में शामिल

लगभग 107 अरब बैरल सिद्ध तेल भंडार

प्रतिदिन 10.9 मिलियन बैरल उत्पादन

ओपेक+ के माध्यम से तेल कीमतों पर प्रभाव

भारत

सीमित घरेलू तेल भंडार (लगभग 5 अरब बैरल)

प्रतिदिन उत्पादन 0.9 मिलियन बैरल

लगभग 85% कच्चा तेल आयात पर निर्भर

भारत की यह निर्भरता उसे वैश्विक तेल बाजार के उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील बनाती है।

अमेरिका-रूस-भारत तेल व्यापार का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

20वीं सदी की शुरुआत में तेल एक रणनीतिक संसाधन के रूप में उभरा।

1920 के दशक में अमेरिका वैश्विक तेल बाजार का नेतृत्व कर रहा था।

1917 की रूसी क्रांति के बाद रूस ने अपने तेल संसाधनों का विकास शुरू किया।

शीत युद्ध काल में भारत ने संतुलित नीति अपनाई। 1971 में भारत-सोवियत मैत्री संधि के बाद भारत ने सोवियत संघ से तेल आयात बढ़ाया।

1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस के ऊर्जा क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय निवेश बढ़ा। अमेरिका और भारत—दोनों ने रूस के साथ तेल सहयोग को आगे बढ़ाया।

अमेरिकी ऊर्जा नीतियों का भारत पर प्रभाव

अमेरिका की ऊर्जा नीतियां, विशेषकर: ईरान और वेनेजुएला पर प्रतिबंध और वैश्विक व्यापार समझौते भारत की तेल आपूर्ति को प्रभावित करती हैं।

इन प्रतिबंधों के कारण: तेल कीमतों में अस्थिरता, वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं की तलाश और आयात लागत में वृद्धि

इसी कारण भारत ने रूस, अफ्रीकी देशों और मध्य-पूर्व से तेल आयात का दायरा बढ़ाया है।

भारत के तेल बाजार में रूस की बढ़ती भूमिका

पिछले कुछ वर्षों में रूस भारत के लिए एक महत्वपूर्ण तेल आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है।

प्रमुख कारण: रियायती कीमतों पर रूसी कच्चा तेल

ONGC, IOC और Rosneft के बीच संयुक्त उपक्रम

अरबों डॉलर का निवेश और तकनीकी सहयोग

यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद भारत-रूस तेल व्यापार और मजबूत हुआ, जिससे भारत को ऊर्जा सुरक्षा में लाभ मिला।

भू-राजनीतिक तनाव और तेल व्यापार

अमेरिका-रूस के बीच बढ़ते तनाव का सीधा असर वैश्विक तेल बाजार पर पड़ता है।

इसके प्रभाव: तेल आपूर्ति में बाधा

कीमतों में तेज़ उतार-चढ़ाव

भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर आर्थिक दबाव

भारत को ऐसे में अमेरिका और रूस—दोनों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की चुनौती रहती है।

भारत की अर्थव्यवस्था पर तेल व्यापार का असर

तेल कीमतों में बदलाव का प्रभाव

महंगाई दर

परिवहन और उत्पादन लागत

रुपया-डॉलर विनिमय दर

लगभग 85% तेल आयात के कारण भारत का व्यापार घाटा बढ़ता है। इससे विदेशी मुद्रा भंडार और आर्थिक स्थिरता प्रभावित होती है।

भारत में तेल व्यापार (Oil Trade) का भविष्य और स्थिरता

भारत अब नवीकरणीय ऊर्जा की ओर तेजी से बढ़ रहा है सौर और पवन ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन, ग्रीन हाइड्रोजन आदि।

सरकार का लक्ष्य है तेल पर निर्भरता कम करना, कार्बन उत्सर्जन घटाना, दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना

निष्कर्ष: भविष्य की दिशा

अमेरिका, रूस और भारत के बीच तेल व्यापार आने वाले वर्षों में भू-राजनीति, पर्यावरण नीतियों, नवीकरणीय ऊर्जा संक्रमण
पर निर्भर करेगा।

भारत के लिए चुनौती यह है कि वह सस्ती और सुरक्षित तेल आपूर्ति सुनिश्चित करे, साथ ही स्वच्छ ऊर्जा की ओर संतुलित बदलाव करे। यही रणनीति भारत को वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य में मजबूत बनाएगी।

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